0

मनुष्य की लगन में रुकावट

LACK IN DILIGENCE…Could damage the men’s…FLOW OF RESISTANCE

 

 

MEANING in Hindi –

 

मनुष्य की लगन में रुकावट आना,
यही कारण मनुष्य की बाधा बन जाती है,
उसके शरीर में बाधा घातक विघुत धारा बनके तैरती है||

 

~ Ramdhun Singh

 

Share This
0

आखरी खत शायरी

इश्क़ लफ़्ज़ों से आंखो में उतर आया है
जब हमें उसका आखरी खत आया है
खत में आंसू के निशान थे जहां-जहां
वहां-वहां शब्द-ए-वफा आया है
ये हाल है अब तो कि दस्तक
कोई भी दरवाज़े पे दे तो लगता है तु आया है

 

~ unknown

 

Share This
0

ज़िक्र कुछ यार का किया जाये | Gazal

ग़ज़ल 1

ज़िक्र कुछ यार का किया जाये
ज़िन्दगी आ ज़रा जिया जाये हो
चुकी हो अगर सज़ा पूरी
दर्दे -दिल को रिहा किया जाये
चाँद छूने के ही बराबर है
मखमली हाथ छू लिया जाये
दर्द-ओ-ग़म की बहुत ज़रूरत है
चल कहीं दिल लगा लिया जाये
हसरतें ईद की अधूरी हैं
ख़ामुशी से जता दिया जाये

 


 

ग़ज़ल 2

 

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है एतिबार एतिबार है
तो है छोड़ कर मुझको सिर्फ़ इक वो चाँद हिज़्र का राज़दार है
तो है बावला दिल मेरी तो सुनता नहीं आपका इख़्तियार है
तो है मैं हूँ नादाँ अगर तो हूँ तो हूँ वो अगर होशियार है तो है
दीद का लुत्फ़ हो गया हासिल अब नज़र कर्ज़दार है तो है

 


 

ग़ज़ल 3

दर्द जब दिल का दुबाला हो गया
चेह्रा चेह्रा इक रिसाला हो गया
रात भर पढ़ते रहे हम चाँद को
आसमाँ इक पाठशाला हो गया
लोरियाँ माँ ने सुनाई और फिर
मेरे सपनों में उजाला हो गया
जब अना कुचली गई तो ये हुआ
आँख रोई दिल में छाला हो गया है
मुहब्बत आबे-ज़मज़म की तरह
पी लिया जिसने वो आला हो गया

 

– सारथी बैद्यनाथ

 

Share This
0

कोरोना मुक्त विश्व बनाना है

दोस्त कुछ ही चाहिए, आगे तक साथ निभाने को।
अनगिनत न सही गिनती के, पर सुन सके अनकहे भावों को।
भीड़ है बहुत यहाँ .. सब अपने राग में मग्न हैं।
तुमसे ही विश्व बना है… तुमसे ही विश्व बना है…
अपने राग को छोड़ कर अब इस राग पर आना है।
अपने आप को सुरक्षित रख कर दूसरों को जिताना है..
कोरोना मुक्त विश्व बनाना है।
अब तक कितने अपनो को खोया? अब किसका इंतज़ार है?
अब और नहीं जाने देना जानें आओ ऐसी दोस्ती निभायें,
हम भी जीतें… और दूसरों को भी जितायें।
आओ सब मिलकर इसे अपनी आवाज़ बनाएं..

 

~ Urvashi soni

 

Share This
0

आसुओं की बुँदे टपक रही हैं

जिन आखों से आज आसुओं की बुँदे टपक रही हैं,
कभी उन में से दरिया -ए- नूर बरसा करता था,
ये जो चारों और बंजर सा जमीन देख रहे हो ना
कभी यहां पर भी मुस्कुराहट का सैलाब हुआ करता था

 

~ Biswajit Rath

 

Share This
0

यह लॉकडाउन नहीं जीवन रक्षक मंत्र है

लॉकडाउन यह लॉकडाउन नहीं जीवन रक्षक मंत्र है
जिससे बचना है हमें उसका नाम कोरोना षड्यंत्र है|

जिसने इसे बनाया वह तो है अपनी मस्ती में
अब यह फैल रहा हम लोगों की बस्ती में|

यह ना देखे जात पात ना ही देखे कोई धर्म
यह तो अपने चक्कर में सब को लपेटे चाहे राजा हो या रंक|

फैले ना ये सब जगह इसलिए इस्तेमाल करे सैनिटाइज व मास्क
इन दोनों को देखकर ही कोरोना दूर से ही जाता भाग|

ना हाथ मिलाये ना गले मिले बस कुछ दिन की तो बात
एक बार सब ठीक हो जाए फिर मिलते रहिए दिन रात|

आओ हम सब मिलकर ये पहल करें
दूर दार रहकर ही चहल करें|

यह लॉकडाउन नहीं जीवन रक्षक मंत्र है
जिससे बचना है हमे उसका नाम कोरोना षड्यंत्र है|

 

~ माही गुप्ता

 

Share This
0

मैं अक्सर खुद से पूछता हूँ “मुझे क्या हो गया था”?

चलती हुयी राह से गुमराह हो गया था
ज़िन्दगी को लेकर बेपरवाह हो गया था

मैं अक्सर खुद से पूछता हूँ “मुझे क्या हो गया था”?

नींद से मेरा नाता टूट सा गया था
भूख प्यास से भी ये मन रूठ सा गया था

मैं अक्सर खुद से पूछता हूँ “मुझे क्या हो गया था”?

अकेलेपन से मानो प्यार हो गया था
एक सच्ची ख़ुशी के लिए दिल लाचार हो गया था

मैं अक्सर खुद से पूछता हूँ “मुझे क्या हो गया था”?

अपनों के बिच में अनजान हो गया था
बिना वजह आँखों में आंसू लाना बड़ा आसान हो गया था

मैं अक्सर खुद से पूछता हूँ “मुझे क्या हो गया था”?

आत्मविश्वास तोह मानों,.. जैसे खो गया था
आँखें तो खुली थी, मगर आत्मा कबका सो गया था

मैं अक्सर खुद से पूछता हूँ “मुझे क्या हो गया था”?

 

~ शैलजा

 

Share This
0

मशगुल था वो अपने यारों में

मशगुल था वो अपने यारों में,
हम रात भर करवट बदलते रहे
सोया होगा वो थक हार के,
कह कर ये खुदको बहलाते रहे

 

बेरुखी तो देखिए अगली सुबह
हाल_ए_दिल भी ना जाना उसने
और पागलपन था मेरा, जो रात भर
उसे समझकर तकिए को सहलाते रहे

 

~ Poonam Vaishnav

 

Share This
0

जाने वाले क्या कभी लौट कर भी आते हैं

जाने वाले क्या कभी लौट कर भी आते हैं
छोड़ गए थे जिसे क्या उसे वापस अपना बनाते हैं

जाने का मन तो वो बहुत पहले बनाते हैं
फिर क्यों किसी को बताकर नहीं जाते हैं

अपने ही घर से ये चोरों जैसा निकलना
भला उन्हें क्यों मुनासिब लगता है,
समझते क्यों नहीं यूं घर की लानतें भी साथ ले जाते हैं…
जाने से पहले वे मोहब्बत की जंजीर तोड़ क्यों नहीं देते हैं

नहीं दे सकते जो मोहब्बत का दाना पानी
तो प्रेम के पिंजड़े खोल क्यों नहीं देते हैं

अपनी शोहबत में जिसे करते थे रोशन
उसे जंगल के अंधेरे में अकेला छोड़ क्यों देते हैं…

क्यों अपना इंतजार मुल्तवी करके जाते हैं
लौट कर नहीं आना है ये सीधे क्यों नहीं बतलाते हैं

जब कर ही चुके होते हैं किसी और से दिलदारी गुफ्तगू
तब भी क्यों रखते हैं पहले सी जारी…
जो साथ निभाना नहीं आता तो क्यों झूठे कसमें वादे खाते हैं

अपनी आंखों से मासूम दिल पर खंजर क्योंकर चलाते हैं…
जाने से पहले वे अपने हुस्न को जो इतना सजाते हैं
अपने दिल का आईना क्यों नहीं चमकाते हैं…

घर के सारे साजो सामान जब अपने साथ ले जाते हैं
ले जाते हैं घर की रोशनी, हवा, खुशियां सारी
तो अपनी यादों को क्यों छोड़ जाते हैं

अपनी खुशबू को कोनों में बिखराकर उसे क्यों नहीं समेट जाते हैं…
अपनी जुदाई पर जो जीते जी मौत से अजीज कर देते हैं
पेट में छुरा भोंककर क्यों नहीं जाते हैं….

ये जाने वाले भी भला कहाँ लौटकर आते हैं
अपने तबस्सुम से महकाया था जिसे कभी
उसे लौटकर फिर गले लगाना तो दूर की बात
उसकी मौत पर दुआ करने भी वापस नहीं आते हैं

जाने वाले क्या कभी लौट कर भी आते हैं
छोड़ गए थे जिसे क्या उसे वापस अपना बनाते हैं

 

~ Nupoor Kumari

 

Share This
0

इश्क़ करने से पुरे शहर में बदनाम हो गया

आज कितने अरसे बाद तुझे देखा तो परेशान हो गया
कितनी बदल गयी हो देख के हैरान हो गया
एक पल सोचा की… क्या ये वही लड़की हैं ……..
जिसको इश्क़ करने से मैं पुरे शहर में बदनाम हो गया

 

~ कशिश बत्रा

 

Share This
Page 7 of 15
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 15