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कुछ मज़बूरी थी, जो हर कदम कांटो पर चल गए

कुछ इम्तिहानो को, कुछ जुबानो को, बंद आँखों से सह गए वो
ना कमजोरी थी, ना ही जी हुजूरी थी
बस कुछ मज़बूरी थी जो अपना हर कदम कांटो पर चल गए वो

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दुखो के बोझ में ज़िन्दगी

दो लाइन्स उनके लिए जो ज़िन्दगी के दुखो से परेशान हैं, ज़िन्दगी की उलझनों में फंस गए हैं:

 

“दुखो के बोझ में ज़िन्दगी कुछ इस तरह डूबे जा रही हैं
की मेरी हर एक चाहत, हर एक आस टूटे जा रही हैं|”

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