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मैंने कोरोना का रोना देखा है

Corona ka Rona Sad But True Poem

 

मैंने कोरोना का रोना देखा है!
और उम्मीदों का खोना देखा है!!

 

लाचार मजदूरों को रोते देखा है!
गिरते पड़ते चलते और सोते देखा है!

 

पिता को सूनी आंखों से तड़पते देखा है!!
तो मां की गोद में बच्चे को मरते देखा है!

 

गरीबों का खुलेआम रोष देखा है!!
तो मध्यमवर्ग का मौन आक्रोश देखा है!

 

पीएम केयर के लिए भीख की शैली देखी है!
तो उसी पैसे से वर्चुअल रैली देखी है!!

 

गरीबों को अस्पतालों में लुटते देखा है! !
तो निर्दोषों को बेवजह पिटते देखा है!

 

अल्लाह भगवान की दुकानों का बंद भी होना देखा है!
तो रोना रोती सरकारों का अंत भी होना देखा है!!

~ Dr. Anita

 

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CORONA-E-DARD

CORONA-E-DARD

 

Ye jo dard hai bada bedard hai
Sahar bhar ke dard ka dukandaar hai

 

Na guzarti hai ab ye bechain raate,
Sahar-e-azaab me rota ye dil hain

 

Ye kaisi khamoshi kohra sa chaya hai,
Kiski aib me aaj lab sabke sile hai,

 

Ye bhigi aankhe ye laasho ke bistar,
In saazisho ke piche wo lambi deewar hai

 

Ab na saha jata ye apno se bichadna,
Ae khuda ab ek tera hi sahara hai

 

Bheegi aankho me fir wo hansi lauta de kyuki,
Ess dard ka ye RAG bhi ek khariddar hai

 

~ RUDRA GOSWAMI (RAG)

 

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कहर कोरोना, विनती मेरे मालिक तुम मेहर करो ना

 

 

हे ईश्वर आन पड़ा है कहर कोरोना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

भूल गए थे हम हस्ती तुम्हारी
मालिक संभाल ले अब कश्ती हमारी
अपने बच्चों को अब और सीख मत दो ना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

प्रकृति की वेदना हम क्यों ना सुन पाए
आज अपनों की चीखे हमें यह बताएं
बहुत बड़ा ऋण प्रकृति का है चुकाना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

रूह कांप जाती है आज ऐसी घड़ी है
फिर भी तेरी रहमत की आशा सबसे बड़ी है
ऐ विधाता विधि का यह लेख बदल दो ना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

मोल क्या है अपनों का आज तूने सिखाया
घर बंद कर दिल के दरवाजों को खुलवाया
मकसद तेरा था हम सोते हुए को जगाना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

आज हिंदू मुस्लिम सिख हो या इसाई
सबकी आंखें करुणा से हैं भर आई
कितना मुश्किल है अपनों से दूर जाना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

नतमस्तक हम देश के उन रख वालों के
खुद को भूल जो लगे हैं लड़ने महामारी से
इनके नाम जले दियो को मत बुझाना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

गाते पंछी, निर्मल नदिया वायु बिन जहर
बरसों के बाद आज देखी ऐसी सहर
साफ खुला आसमाँ कहे अब तो समझोना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करोना

 

मानते हम हुई भूल हमसे बड़ी है
माफ बच्चों को करना जिम्मेदारी तेरी है
हाथ जोड़े इन बेबस बच्चों को क्षमा दो ना
विनती मेरे मालिक तुम महर करोना

 

हे ईश्वर आन पड़ा है कहर कोरोना
विनती मेरे मालिक तुम मेहर करो ना

 

CA CS Nisha Patel

 


ये भी जरूर पढ़िए – रण: धेर्य का कोरोना महामारी कविता

 

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रण: धेर्य का कोरोना महामारी पर कविता

आज सम्पूर्ण विश्व कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है। और ये महामारी लगातार अपने अपने पैर पसारती जा रही है। जिसके के कारण हर देश जूझ रहा है और इससे निपटने का निजात खोज रहा है। वहीं अगर भारत की बात करें तो यहाँ भी ये महामारी रुकने का नाम नहीं ले रही है जिसके चलते सम्पूर्ण भारत को लॉकडाउन कर दिया गया है। और प्रत्येक नागरिक इसका पालन करते हुए अपने घर में रुक कर वर्तमान स्थिति को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इन्ही परिस्थितियों की उपज का एक उदाहरण है ये कविता जिसे अतुल कुमार ने बखूब ही परिस्थितियों में ढाला है आप भी पढ़ें।

 

रण: धेर्य का | कोरोना महामारी पर कविता

 

बंद दिहाड़ी घर बैठे हैं,
कूचे, गलियाँ सब सुन्न हो गए।

उदर रीते और आँख भरीं हैं
कुछ घर इतने मजबूर हो गए।

कहें आपदा या रण समय का,
जिसमे स्वयं के चेहरे दूर हो गए।

“घर” भरे हैं “रणभूमि” खाली
मेल-मिलाप सब बन्द हो गए।

घर का बेटी-बेटा दूर रुका है
कई घर मे बिछड़े पास आ गए।

हर घर में कई स्वाद बने हैं
कई रिश्ते मीठे में तब्दील हो गए।

बात हालातों की तुम समझो
तुम्हारे लिए कुछ अपनों से दूर हो गए।

जो है अपना वो पास खड़ा है।
मन्दिर-मस्जिद आदि सब दूर हो गए।

धैर्य रखो, बस ये है रण धैर्य का
सशस्त्र बल आदि कमजोर पड़ गए।

है बलवान धैर्य स्वयं में
अधैर्य के बल पे सब हार गए।

 

अतुल कुमार

 

 


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