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बच्चे मन के सच्चे

आसमान सिर पर उठाते हैं बच्चे, खेलते-कूदते और मुस्काते हैं बच्चे।
ये बच्चे भी मन के सच्चे होते हैं, सीखते और कुछ सिखाते हैं बच्चे।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं

किसी को परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं,
मेरी कोशिश है किसी के कुछ काम आ सकूँ
अपनी ज़िंदगी तो सभी जीते हैं आराम से,
मन से किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकूँ।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

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अब तो मन भी रेगिस्तान जैसा

दिन कटता नहीं अब रात नहीं होती, तेरी मेरी कोई मुलाकात नहीं होती।
अब तो मन भी रेगिस्तान जैसा है, खुशियों की अब बरसात नहीं होती।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

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ज़िंदगी तो चार दिन की

फूलों की तरह हमें सदा खिलना चाहिए,
प्रेमभाव से हमेशा हमें मिलना चाहिए।
ज़िंदगी तो चार दिन की जी भर जिएं,
निःस्वार्थ भाव से परमार्थ करना चाहिए।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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ज़िंदगी का सार हो तुम मां

गुलाब की तरह हो तुम मां! मेरे मन मंदिर में महकती हो।
ज़िंदगी का सार हो तुम मां! तुम्हीं दिल से मुझे समझती हो।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

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मां के आशीर्वाद का अहसास

जब कभी मेरा मन उदास होता है, तब तेरा चेहरा आसपास होता है।
तब मिलता है सुकून और विश्वास, मां! तेरे आशीर्वाद का अहसास होता है।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

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प्यार भी है और तकरार भी

लोग अच्छे भी हैं यहाँ पर, गले लगाने की ज़रूरत है।
प्यार भी है और तकरार भी, सिर्फ़ मुस्कराने की ज़रूरत है।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

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