0

तुम जहां जाओ महफ़िलें लूट ल़ो

गुलाब की तरह ख़ुशमिज़ाज रहो।
चमकते-दमकते आफ़ताब रहो।
तुम जहां जाओ महफ़िलें लूट ल़ो।
सभी के ज़िगर में सरताज़ रहो।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

 

Share This
0

चंचल मन मेरा

मन के अंदर झांक रहा है मन मेरा।
मन की भाषा बोल रहा है मन मेरा।
मन भावों का एक समुंदर होता है।
मन चंचल है घूम रहा है मन मेरा..।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

Share This
0

तेरा मुस्कराना गज़ब ढा गया

तुम्हारी बातों में दिल आ गया था।
नज़र जब मिली थी मैं शर्मा गया था।
अदाओं ने तेरी, दिल मेरा छीना।
तेरा मुस्कराना गज़ब ढा गया था।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

Share This
0

वक्त वो दोस्त है जो

वक्त वो दोस्त है जो सिखाता रहा। हंसाता रहा और रुलाता रहा।
ठोकरें खाकर ही चलना सीखा है। वक्त ही नयी राह दिखाता रहा।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

Share This
0

खुशियों का चांद, अब खिलता नहीं

उड़ा जाता है चांद, छोर मिलता नहीं।
खुशियों का चांद, अब खिलता नहीं।
चांद का रंग रूप, कुछ अलग ढ़ंग का।
अब चांदनी से चांद, कहीं मिलता नहीं।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

Share This
0

बच्चे मन के सच्चे

आसमान सिर पर उठाते हैं बच्चे, खेलते-कूदते और मुस्काते हैं बच्चे।
ये बच्चे भी मन के सच्चे होते हैं, सीखते और कुछ सिखाते हैं बच्चे।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

Share This
0

परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं

किसी को परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं,
मेरी कोशिश है किसी के कुछ काम आ सकूँ
अपनी ज़िंदगी तो सभी जीते हैं आराम से,
मन से किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकूँ।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

Share This
Page 2 of 6
1 2 3 4 5 6