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विश्व में परचम लहरा रही हिंदी

मन के भावों को जता रही हिंदी।
साहित्यिक दर्शन करा रही हिंदी।
अपनी हिंदी जोड़ती है दिलों को।
विश्व में परचम लहरा रही हिंदी।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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जो जीते हैं सिर्फ़ अपनी खुशियों के लिए

जो जीते हैं सिर्फ़ अपनी खुशियों के लिए, उनके लिए रिश्तों का मोल होता नहीं है।
खो जाते हैं वो किसी दूसरी दुनिया में, वास्तव में उनके लिए कोई रोता नहीं है।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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गांव का जीवन, गांव के नज़ारे

गांव के बाजारों में भी, खूब नज़ारे होते थे।
चाट पकौड़ी और बताशों के चटकारे होते थे।
नीम और बरगद की छाया में बैठा करते थे।
खुशियों के पल आपस में वारे न्यारे होते थे।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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मुश्किलें राह पर मिलती रहेंगीं

प्यार से रिश्ता निभाना चाहिए।
सोचकर के दिल लगाना चाहिए।
मुश्किलें राह पर मिलती रहेंगीं।
कर्म पथ पर चलते जाना चाहिए।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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घर के बुजुर्ग, त्यौहार और प्यार

नफ़रतें छोड़कर मन से, प्रेम के गीत हम गाएं।
आपसी बैर को भूलें, अपनों से भी मिल आएं।
सभी त्योहार बतलाते, सदा प्रेम से रहना।
सभी घर के बुज़ुर्गों को, कभी मन से न बिसराएं।

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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