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चंचल मन मेरा

मन के अंदर झांक रहा है मन मेरा।
मन की भाषा बोल रहा है मन मेरा।
मन भावों का एक समुंदर होता है।
मन चंचल है घूम रहा है मन मेरा..।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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खुशियों का चांद, अब खिलता नहीं

उड़ा जाता है चांद, छोर मिलता नहीं।
खुशियों का चांद, अब खिलता नहीं।
चांद का रंग रूप, कुछ अलग ढ़ंग का।
अब चांदनी से चांद, कहीं मिलता नहीं।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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मेरे अपनों पर शायरी

चला जो मैं अपनों के खिलाफ, तो उनके एहसान बीच में आ गए
और की जो कुछ ख्वाइश मैंने, अपनों के अरमान बीच में आ गए
सच – झूठ को जो तोल के देखा, तो सोचा की सच का साथ दू,
पर मेरे अपनों के झूठ को बचाने, भगवान (संस्कार) बीच में आ गए

~ Atul sharma

 

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वो पिता अपना सब कुछ कुर्बान कर देता है

कभी बुरा मत कहना उस इंसान को
अरे तुम्हे खबर तक नही होती
और वो पिता अपना सबकुछ
तुम्हारे लिए कुर्बान कर देता है…

तुम्हारी ख्वाहिशो को पुरा करने के लिए
वो दुनिया से लड़ जाता है…
कदर करो उस पिता की
अरे वो तुम्हारे सपनो को पुरा करने के लिए
अपनी निन्दा तक को भुल जाता है…!!!

~ Dimple kushwaha

 

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परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं

किसी को परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं,
मेरी कोशिश है किसी के कुछ काम आ सकूँ
अपनी ज़िंदगी तो सभी जीते हैं आराम से,
मन से किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकूँ।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘बरसाने’

 

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ज़िंदगी तो चार दिन की

फूलों की तरह हमें सदा खिलना चाहिए,
प्रेमभाव से हमेशा हमें मिलना चाहिए।
ज़िंदगी तो चार दिन की जी भर जिएं,
निःस्वार्थ भाव से परमार्थ करना चाहिए।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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मां के बिना कैसी जीवन की डगर

मां तो ममता का घर होती है।
पास हो तो कहां ये खबर होती है।।
दूर होते हैं तब ये एहसास होता है।
कि मां के बिना कैसी जीवन की डगर होती है।।

 

~ Rb Verman Pratapgarhi

 

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गर्दिश में सितारे

हवाओं के इशारे होते हैं,
नदियों के भी किनारे होते हैं।
सिर्फ अहसास करने की बात है,
कभी कभी गर्दिश में सितारे ह़ोते हैं।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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झूठी शानोशौकत और दिखावा करने वालो पर 4 पंक्तिया

कभी कभी आदमी इतराता बहुत है,
होता कुछ नहीं पर दिखाता बहुत है।
झूठी शानोशौकत में जीना चाहता है,
भेद खुल जाने पर वह शर्माता बहुत है।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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