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मां के बिना कैसी जीवन की डगर

मां तो ममता का घर होती है।
पास हो तो कहां ये खबर होती है।।
दूर होते हैं तब ये एहसास होता है।
कि मां के बिना कैसी जीवन की डगर होती है।।

 

~ Rb Verman Pratapgarhi

 

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गर्दिश में सितारे

हवाओं के इशारे होते हैं,
नदियों के भी किनारे होते हैं।
सिर्फ अहसास करने की बात है,
कभी कभी गर्दिश में सितारे ह़ोते हैं।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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झूठी शानोशौकत और दिखावा करने वालो पर 4 पंक्तिया

कभी कभी आदमी इतराता बहुत है,
होता कुछ नहीं पर दिखाता बहुत है।
झूठी शानोशौकत में जीना चाहता है,
भेद खुल जाने पर वह शर्माता बहुत है।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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कई आए इस जलती शमा को बुझाने

काले गरजते बादलों को धुआँ समझा हैं
मैंने आँधियों को भी हवा समझा हैं…

गिले शिकवे की मुराद हैं उन्हें हमसे
अब क्या बताए हमने दर्द को तो अपनी मेहबूबा समझा हैं

भरा दिल तोड़े कोई और वजह कोई
किसी को कितना कोसे अब हमने खुद को बेवफा समझा हैं

कई आए इस जलती शमा को बुझाने
यूँ ही बुझा जाए, क्या हलवा समझा हैं

 

~ Kshitij Muktikar

 

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ए खुदा तेरी रज़ा क्या है?

इन नसीहतों में मज़ा क्या है,
इन इनायतों में रखा क्या है,

जो मौलवी बने बैठे हैं यहाँ,
इनसे पूँछों इन्होंने करा क्या है।

भले आदमी का निशान क्या है,
असल नवाज़िश ए करम क्या है,

क्यों डरे भला क़यामत से इतना,
दर्द से निजात नहीं तो मौत क्या है,

इन तालिमों की वजह क्या है,
ए खुदा तेरी रज़ा क्या है,

हाँ मैं करता हूँ सवाल बोलो,
इन ग्रंथों में मेरी सज़ा क्या है।

~ Shubham Jain

 

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माँ बाप के लिए बच्चो को सीख

दो घड़ी के लिए

दो घड़ी के लिए, बैठ जाया करो।
मां बाप के पास भी कभी आया करो।

 

दो घड़ी के लिए……..।।

 

कभी उंगली पकड़कर, चलना सिखाया था।
कभी उनको भी बाहर घुमाया करो।

 

दो घड़ी के लिए…….।।

 

प्यार के दो बोल, अनमोल हैं।
प्यार से कभी तुम, मनाया करो।

 

दो घड़ी के लिए……..।।

 

माना तुम पढ़ लिखकर, इंसान हो गए।
कभी तो इंसानियत, दिखाया करो।

 

दो घड़ी के लिए……..।।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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