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माँ तुझसे ये दुनिया मेरी, तुझसे ही जीवन, माँ पर कविता

मेरे वज़ूद की कहानी वो, मेरे सर पे जिसका साया हैं,
माँ तुझसे ये दुनिया मेरी, तुझसे ही जीवन पाया हैं,

हर एहसास तुझसे ही जाना मैने इस जहाँ में आके
है कर्ज़दार उसका ये बेटा, दूध जो तूने पिलाया हैं

पहला लफ्ज़ तू बनी मेरे जीवन का, खुदा के करम से,
पकड़ मेरे हाथों को, मुझे संभलना सिखाया हैं

मेरे एक छींक पे तड़पना तेरा, कितनी रात तू सोई नहीं
खुद को जला दोपहर भर, तेज धुप से बचाया हैं

हूँ आज मैं अपने क़दमों पे, जहाँ को पार कर के,
हूँ पर तेरे क़दमों में, जिससे हर सीख को पाया हैं

तेरी ममता का प्यासा हूँ, लुटा दे मुझपे “सच्चा प्यार”
पूजता हूँ तुझे ऐसे, की भगवन की जगह बिठाया हैं

है दुआ ऊपर वाले से, गर वो इस जहाँ में कही है
रखे सदा खुश उसे, जिसने मुझे दुनिया में लाया हैं

मेरे वज़ूद की कहानी वो, मेरे सर पे जिसका साया हैं,
माँ तुझसे ये दुनिया मेरी, तुझसे ही जीवन पाया हैं,

 

~ कुनाल

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ज़माने ने मुझे चोट दी है – दुःख व् गहराई भरी कविता

चले हैं लोग मैं रस्ता हुआ हूं
मुद्दत से यहीं ठहरा हुआ हूं

ज़माने ने मुझे जब चोट दी है
मैं जिंदा था नहीं जिंदा हुआ हूं

मैं पहले से कभी ऐसा नहीं था
मैं तुमको देखकर प्यारा हुआ हूं

मैं कागज सा न फट जाऊं
ए लोगो उठाओ ना मुझे भीगा हुआ हूं

मेरी तस्वीर अपने साथ लेना
अभी हालात से सहमा हुआ हूं

कभी आओ इधर मुझको समेटो
मैं तिनकों सा कहीं बिखरा हुआ हूं

चलो अब पूछना तारों की बातें
अभी मैं आसमां सारा हुआ हूं

मुसलसल बात तेरी याद आई गया
वो वक़्त मैं उलझा हुआ हूं

बुरा कोई नहीं होता जन्म से
मुझे ही देख लो कैसा हुआ हूं

ज़माने ने मुझे जितना कुरेदा
मैं उतना और भी गहरा हुआ हूं

~ सुरेश सांगवान (saru)

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ए माँ, आ, सीने से लगाके इस दिल को राहत दे दे

ए माँ तेरी याद बहुत आती हैं हमे
अब तो तेरी दुआएं ही बचाती हैं हमे
अपने क़दमों की हमे जन्नत दे दे..
सीने से लगाके इस दिल को राहत दे दे

हम सबको अकेला तू क्यों छोड़ गयी
अपने बच्चों का दिल क्यों तोड़ गयी
आ माँ हम सब को वो चाहत दे दे
सीने से लगाके इस दिल को राहत दे दे

ए – माँ तेरी जुदाई, अब अक्सर रुलायेगी
तेरा गुस्सा करना, तेरी वो बातें अब सताएगी
ए माँ हमे अपनी ममता की दौलत दे दे
सीने से लगाके इस दिल को राहत दे दे

अब साया कौन सा ठहरेगा सर पर
कैसे आएगी अब रौनक घर पर
ए माँ, आ हमे जीने की हसरत दे दे
सीने से लगाके इस दिल को राहत दे दे

 

-Azeem

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ज़िन्दगी पर अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रसिद्ध कविता

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

– अटल बिहारी वाजपेयी

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भारतीय जनता के लिए अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रसिद्ध कविता

क़दम मिला कर चलना होगा

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

~ अटल बिहारी वाजपेयी

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पिता पर खूबसूरत कविता

पिता एक उम्मीद है, एक आस है
परिवार की हिम्मत और विश्वास है,
बाहर से सख्त अंदर से नर्म है
उसके दिल में दफन कई मर्म हैं।

पिता संघर्ष की आंधियों में हौसलों की दीवार है
परेशानियों से लड़ने को दो धारी तलवार है,
बचपन में खुश करने वाला खिलौना है
नींद लगे तो पेट पर सुलाने वाला बिछौना है।

पिता जिम्मेवारियों से लदी गाड़ी का सारथी है
सबको बराबर का हक़ दिलाता यही एक महारथी है
सपनों को पूरा करने में लगने वाली जान है
इसी से तो माँ और बच्चों की पहचान है।

पिता ज़मीर है पिता जागीर है
जिसके पास ये है वह सबसे अमीर है,
कहने को सब ऊपर वाला देता है
पर खुदा का ही एक रूप पिता का शरीर है।

– संदीप कुमार सिंह

Dard Bhari Sad Alone Boy Poetry

जो मिला मुसाफ़िर वो रास्ते बदल डाले
दो क़दम पे थी मंज़िल फ़ासले बदल डाले

आसमाँ को छूने की कूवतें जो रखता था
आज है वो बिखरा सा हौंसले बदल डाले

शान से मैं चलता था कोई शाह कि तरह
आ गया हूँ दर दर पे क़ाफ़िले बदल डाले

फूल बनके वो हमको दे गया चुभन इतनी
काँटों से है दोस्ती अब आसरे बदल डाले

इश्क़ ही ख़ुदा है सुन के थी आरज़ू आई
ख़ूब तुम ख़ुदा निकले वाक़िये बदल डाले

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