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अपनों ने ही किया क़त्ल मेरी इच्छाओं का

बहुत दिन हो गए देखते देखते
अब मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ,

नादान था मैं….

नहीं था अंदाज़ा ज़माने के रीति रिवाज़ो का
वक़्त ने संघर्ष से सिखाया रुख परखना हवाओं का

फर्क नहीं पड़ा मुझपे दूसरों की बद्दुआओं का
अपनों ने ही किया क़त्ल मेरी इच्छाओं का

 

~ अतुल शर्मा

 


 

Bahut din ho gaye, dekhte dekhte,
Ab Main bhi kuch kahna chahta hu,
Naadan tha main…

Nahi tha andaja jamane ke reeti rivazo kaa…
Waqt ne struggle se sikhaya rukh parakhna hawao ka..

Fark ni pda mujhpe doosron ki badduao ka,
Apno ne hi kiya qatl meri icchao ka….

 

~ Atul Sharma

 

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गर्दिश में सितारे

हवाओं के इशारे होते हैं,
नदियों के भी किनारे होते हैं।
सिर्फ अहसास करने की बात है,
कभी कभी गर्दिश में सितारे ह़ोते हैं।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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तुम मेरी सरगम बनो और मैं संगीत

तुम मेरी लय बनो और मैं तेरा गीत बनूं ,
तुम मेरी प्रीत बनो और मैं तेरा मीत बनूं ।
दुख की बरसात हो या खुशियों की बेला,
तुम मेरी सरगम बनो और मैं संगीत बनूं।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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Pyar Ke Effects Shayari

जब रंग मोहब्बत का चढ़ता है,
तो ख्वाहिशे शौकीन हो जाती है।
वादियां हँसीन और फिज़ाये संगीन हो जाती है,
दिल में चेहरा सिर्फ दिलबर का होता है ,
और सारी दुनिया रंगीन हो जाती है।
इश्क़ में मेहबूबा के दीवाने इस कदर मगरूर हो जाते है,
दुनिया के लिए अज़िब और आशिकी में अज़िज़ बनकर,
सारी दुनिया में मशहूर हो जाते है।

 

-आयुष्मान पांडेय

 

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झूठी शानोशौकत और दिखावा करने वालो पर 4 पंक्तिया

कभी कभी आदमी इतराता बहुत है,
होता कुछ नहीं पर दिखाता बहुत है।
झूठी शानोशौकत में जीना चाहता है,
भेद खुल जाने पर वह शर्माता बहुत है।

 

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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ज़िंदगी जीने का नया ढ़ंग होना चाहिए

ज़िंदगी में रंग और उमंग होना चाहिए,
एक सच्चा हमसफर भी संग होना चाहिए
माता पिता, गुरुओं का आशीष बना रहे,
ज़िंदगी जीने का नया ढ़ंग होना चाहिए।

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

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कई आए इस जलती शमा को बुझाने

काले गरजते बादलों को धुआँ समझा हैं
मैंने आँधियों को भी हवा समझा हैं…

गिले शिकवे की मुराद हैं उन्हें हमसे
अब क्या बताए हमने दर्द को तो अपनी मेहबूबा समझा हैं

भरा दिल तोड़े कोई और वजह कोई
किसी को कितना कोसे अब हमने खुद को बेवफा समझा हैं

कई आए इस जलती शमा को बुझाने
यूँ ही बुझा जाए, क्या हलवा समझा हैं

 

~ Kshitij Muktikar

 

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ए खुदा तेरी रज़ा क्या है?

इन नसीहतों में मज़ा क्या है,
इन इनायतों में रखा क्या है,

जो मौलवी बने बैठे हैं यहाँ,
इनसे पूँछों इन्होंने करा क्या है।

भले आदमी का निशान क्या है,
असल नवाज़िश ए करम क्या है,

क्यों डरे भला क़यामत से इतना,
दर्द से निजात नहीं तो मौत क्या है,

इन तालिमों की वजह क्या है,
ए खुदा तेरी रज़ा क्या है,

हाँ मैं करता हूँ सवाल बोलो,
इन ग्रंथों में मेरी सज़ा क्या है।

~ Shubham Jain

 

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