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जीवन रूपी सदी है मां

कलकल बहती नदी है मां
जीवन रूपी सदी है मां
पोंछती है आंसू छुपकर
पर कुछ नहीं कहती है मां

~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’

 

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